कुशीनगर अबुलैस अंसारी कुशीनगर की रिपोर्ट -
भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर को 145 वर्षों से तथागत बुद्ध के धातु विभाजन स्थल की तलाश है। तलाश इसलिए भी हो रही है, क्योंकि इसके बिना भगवान बुद्ध का कुशीनगर से जुड़ा इतिहास अधूरा है। बौद्ध मतावलंबियों की दर्शन यात्रा अधूरी है। खोदाई में भगवान बुद्ध से जुड़े तीन प्रमुख स्थान, प्रथम आसन स्थल (माथा कुंवर मंदिर), अंतिम उपदेश स्थल (महापरिनिर्वाण मंदिर) और दाह संस्कार स्थल (रामाभार स्तूप) तो मिले, लेकिन जहां भगवान बुद्ध की अस्थियां कई भागों में बांटी गई थी, वह स्थान आज भी प्रमाण के इंतजार में है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कुशीनगर में एक स्थान चिह्नित किया है। तीन सर्वे टीम ने यहां प्रमाण मिलने की संभावना जताई है, लेकिन अभी तक उत्खनन नहीं शुरू हो पाया है।
इतिहासकार कार्लाइल ने 1876 में उत्खनन कराया था। यहां भगवान बुद्ध की पांचवीं सदी की शयन मुद्रा व 11वीं सदी की भू स्पर्श प्रतिमा मिली। खोदाई के दौरान ही टीले के रूप में दाह संस्कार स्थल भी मिला। इसके बाद कुशीनगर पुरातात्विक मानचित्र पर आया। बौद्ध धर्मावलंबियों के अनुसार महापरिनिर्वाण के लिए कुशीनगर पहुंचने पर भगवान बुद्ध ने जहां बैठकर निर्वाण (देह त्याग करना) की अनुमति मांगी, उसे प्रथम आसन स्थल कहा गया। यहीं भगवान बुद्ध की भू स्पर्श मुद्रा वाली प्रतिमा है।
बुद्ध ने जहां लेटकर अंतिम शिष्य सुभद्र को दीक्षा दी, वह अंतिम आसन स्थल है, जहां उनकी शयन मुद्रा प्रतिमा है। दाह संस्कार स्थल पर रामाभार स्तूप है। चौथा प्रमुख स्थान धातु विभाजन स्थल है, जहां भगवान बुद्ध की अस्थियों को सात भागों में बांटा गया था। बौद्ध धर्मावलंबी इन स्थानों का दर्शन करने आते हैं, लेकिन धातु विभाजन स्थल चिह्नित न होने से उनकी दर्शन यात्रा अधूरी रह जाती है। करीब दो साल पहले यहां प्रमाण मिलने की संभावना से संबंधित रिपोर्ट दी गई थी, लेकिन उत्खनन नहीं शुरू हुआ।
संरक्षण सहायक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, उप अंचल कुशीनगर शादाब खान ने कहा कि जहां धातु विभाजन स्थल होने की रिपोर्ट दी गई है, वहां साफ-सफाई कराई गई है। प्रशासन से चहारदीवारी बनवाने का आग्रह किया गया है ताकि उत्खनन कराया जा सके। चहारदीवारी बनते ही उत्खनन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

